इतिहास

श्रावस्ती हिमालय की तलहटी मे बसे भारत-नेपाल सीमा के सीमावर्ती जिले बहराइच से महज 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है | उत्तर प्रदेश के इस जिले की पहचान विश्व के कोने-कोने मे आज बौद्ध तीर्थ स्थल के रूप मे है | इस जनपद का गठन दिनांक 22-05-1997 को हुआथा |दिनांक 13-01-2004 को शासन द्वारा इस जनपद का अस्तित्व समाप्त कर दिया गया था | पुनः माह जून 2004 सी यह जनपद अस्तित्व मे आया है | जनपद का मुख्यालय भिंगा मे है ,जो श्रावस्ती से 55 किमी0की दूरी पर है |जनपद कोशल एक प्रमुख नगर था | भगवान बुद्ध के जीवन काल में यह कोशल देश की राजधानी थी | इसे बुद्धकालीन भारत के 06 महानगरो चम्पा ,राजगृह , श्रावस्ती ,साकेत ,कोशाम्बी ओर वाराणसी मे से एक माना जाता था | श्रावस्ती के नाम के विषय मे कई मत प्रतिपादित है| बोद्ध ग्रंथो के अनुसार अवत्थ श्रावस्ती नामक एक ऋषि यहाँ रहते थे , जिनके नाम के आधार पर इस नगर का नाम श्रावस्त पड़ गया था | महाभारत के अनुसार श्रावस्ती नाम श्रावस्त नाम के एक राजा के नाम पड़ गया | ब्राह्मण साहित्य , महाकाव्यों एवं पुराणों के अनुसार श्रावस्त का नामकरण श्रावस्त या श्रावास्तक के नाम के आधार पर हुआ था | श्रावस्तक युवनाय का पुत्र था ओर पृथु की छठी पीड़ी मे उत्पन्न हुआ था | वही इस नगर के जन्मदाता थे ओर उनही के नाम पर इसका नाम श्रावस्ती पड़ गया | महाकाव्यों एवं पुराणों मे श्रावस्ती को राम के पुत्र लव की राजधानी बताया गया है | बोधह ग्रांटों के अनुसार, वहाँ 57 हज़ार कुल रहते थे ओर कोसल नरेशो की आमदनी सबसे ज्यादा इसी नगर से हुआ करती थी| यह चौड़ी गहरी खाई से खीरा हुआ था | इसके अतिरिक्त इसके इर्द –गिर्द एक सुरक्षा दीवार थी, जिसमे हर दिशा मे दरवाजे बानु हुए थे | हमारी प्राचीन कलाँ मे श्रावस्ती के दरवाजो का अंकन हुआ है | चीनी यात्री फ़ाहयान ओर हवेनसांग ने भी श्रावस्ती के दरवाजो का उल्लेख किया है | यहाँ मनुष्यो के उपयोग – परिभाग की सभी वस्तुए सुलभी थी, अतः इसे सावत्थी का जाता है | श्रावस्ती की भौतिक समृद्धि का प्रमुख कारण यह था कि यहाँ पर तीन प्रमुख व्यापारिक पाठ मिलते थे , जिससे यह व्यापार का एक महान केंद्र बन गया था | यह नगर पूर्वे मे राजग्रह से 45 योजना दूर आकर बुद्ध ने श्रावस्ती विहार किया था | श्रावस्ती से भगवान बुद्ध के जीवन ओर कार्यो का विशेष सम्बंध था | उल्लेखनीय है की बुद्ध ने अपने जीवन अंतिम पच्चीस वर्षो के वर्षवास श्रावस्ती मे ही व्ययतीत किए थे | बोद्ध धर्म के प्राचीर की दृस्टी से भी श्रावस्ती का महत्वपूर्ण स्थान था | भगवान बुद्ध के प्रथम निकायो के 871 सुत्तों का उपदेश श्रावस्ती मे दिया था, जिसमे 844 जेतवन मे, 23 पुब्बाराम मे ओर 4 श्रावस्ती के आस –पास के अन्य स्थानो मे उपविष्ट किए गए | श्रावस्ती मे जैन मतावलंबी भी रहते थे | इस धर्म के प्रवर्तक महावीर स्वामी यहाँ कई बार आ चुके थे | बोद्ध मतावलंबीयो की भांति जैन धर्मानुयायी भी इस नगर को प्रमुख धार्मिक स्थान मानते थे | जैन साहित्य मे इसके लिए चंदपुरी तथा चंद्रिकापुरी नाम भी मिलते है | जैन धर्म के प्रचार केंद्र के रूप मे यह विख्यात था | श्रावस्ती जैन धर्म के तीसरे तीर्थकर संभवनाथ व आठवे तीर्थकर चंद्रप्रभानाथ की जन्मस्थली थी | महावीर ने भी यहाँ एक वर्षावास व्यतीत किया था जैन धर्म मे सावधि अथवा सावत्थीपुर के प्रचुर उल्लेख मिलते है| जैन धर्म भगवती सूत्र के अनुसार श्रावस्ती नगर आर्थिक क्षेत्र मे भौतिक समृधि के चमोत्कृष पर थी | यहाँ के व्यापारियो मे शंख ओर मकखली मुख्य थे, जिन्होने नागरिकों के भौतिक समृद्धि के विकास मे महत्वपूर्ण योगदान दिया था | जैन श्रोतों से पता चलता है कि कालांतर मे श्रावस्ती आजीवक संप्रदाय के एक प्रमुख केंद्र बन गया | श्रावस्ती का प्रगेतिहासिक काल का कोई प्रमाण नहीं मिला है शिवालिक पर्वत श्रखला कि तराई मे स्थित यह क्षेत्र सघन वन व औषधियों वनस्पतियों से आच्छादित था | शीशम के कोमल पत्तों कचनार के रकताम पुष्ट व सेमल के लाल प्रसूत कि बांसती आभा से आपूरित यह वन खंड प्रकृतिक शोभा से परिपूर्ण रहता था| श्रावस्ती के प्राचीन इतिहास को प्रकार्ण मे लाने के लिए प्रथम प्रयास जनरल कनिघम ने किया | उन्होने वर्ष 1863 मे उत्खनन प्रारम्भ करके लगभग एक वर्ष के कार्य मे जेतवन का थोड़ा भाग साफ कराया इसमे इसमे उनको बोधिसत्व की 7 फुट 4 इंच ऊंची प्रतिमा प्राप्त हुई, जिस पर अंकित लेख मे इसका श्रावस्ती बिहार मे स्थापित होना ज्ञात है | इस प्रतिमा के अधिस्ठन पर अंकित लेख मे तिथि नष्ट हो गयी है | परंतु लिपि शस्त्र के आधार पर यह लेख कुषाण काल का प्रतीत होता है | जनपद का प्रमुख प्रयटन स्थल पर भगवान बुद्ध की तपोस्थली कटरा श्रावस्ती थाना इकौना मे है कटरा श्रावस्ती मे बोद्ध धर्म अनुयायियों द्वारा बोद्ध मंदिरो का निर्माण कराया गया है | जिसमे वर्मा बोद्ध मंदिर , लंका बोद्ध मंदिर , चाइना मंदिर , दक्षिण कोरिया मंदिर के साथ –साथ थाई बोद्ध मंदिर है | थायलैंड द्वारा डेनमहामंकोल मेडीटेशन सेंटर भी निर्मित कराया गया , जहां पर भरी संख्या मे विदेशी पर्यटको का आवागमन रहता है |